भारत की धरती रहस्यों और अद्भुत कहानियों से भरी हुई है। यहां हर कोना किसी न किसी ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक महत्व से जुड़ा हुआ है। इन्हीं रहस्यों में से एक है द्वारका (Dwarka)– एक ऐसा शहर जिसे समुद्र ने अपनी लहरों के नीचे छिपा लिया, लेकिन जिसके बारे में कहा जाता है कि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का निवास स्थान था। सवाल यह है – क्या यह सच है कि द्वारका वास्तव में भगवान कृष्ण का नगर था? आइए, इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं।
द्वारका(Dwarka) – इतिहास और पौराणिक कथाओं का संगम
हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों महाभारत और भागवत पुराण के अनुसार, द्वारका वह पवित्र नगरी थी जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर से प्रस्थान करने के बाद बसाया था। इसे “सप्तपुरी” यानी सात पवित्र नगरों में से एक माना जाता है। कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद अरब सागर के किनारे एक भव्य नगर बसाया, जिसे द्वारका(Dwarka) कहा गया।
यह नगर सोने, चांदी, और कीमती पत्थरों से सजा हुआ था और इसकी वास्तुकला अद्भुत थी। लेकिन महाभारत के अंत में भविष्यवाणी की गई थी कि श्रीकृष्ण के देहांत के बाद यह नगरी समुद्र में डूब जाएगी – और कहा जाता है कि ऐसा ही हुआ।
समुद्र के नीचे मिली द्वारका की खोज
1980 के दशक में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) और समुद्री खोज वैज्ञानिकों ने गुजरात के समुद्र तट के पास समुद्र के नीचे एक अद्भुत खोज की। समुद्र के तल में पत्थरों की दीवारें, सीढ़ियां, मंदिर जैसे ढांचे और पुराने बर्तन पाए गए। कार्बन डेटिंग और वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला कि ये अवशेष लगभग 9000 साल पुराने हैं।
यह खोज इस बात को और मजबूत करती है कि पौराणिक द्वारका सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक वास्तविक नगर था, जिसे समुद्र ने अपनी गोद में समा लिया।
द्वारका डूबने का कारण क्या था?
इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के अनुसार, द्वारका के डूबने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- समुद्र के जलस्तर में वृद्धि – हज़ारों साल पहले समुद्र का स्तर बढ़ने से तटीय नगर डूब गए।
- भूकंप और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं – इनसे नगर समुद्र में समा सकते हैं।
- पौराणिक दृष्टिकोण – महाभारत के अनुसार, यह भगवान की इच्छा थी कि द्वारका का अस्तित्व समाप्त हो जाए।

आज का द्वारका(Dwarka) – तीर्थस्थल
आज का द्वारका(Dwarka), गुजरात के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित है और हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है। यहां का द्वारकाधीश मंदिर दुनिया भर के भक्तों को आकर्षित करता है। यह मंदिर समुद्र के किनारे स्थित है और इसकी ऊंची शिखर से लहराता भगवा ध्वज भक्तों की आस्था का प्रतीक है।
भगवान कृष्ण का डूबा हुआ शहर – आस्था और विज्ञान का मिश्रण
द्वारका(Dwarka) की खोज सिर्फ आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए भी रहस्य का विषय है। जहां भक्त इसे भगवान कृष्ण का नगर मानते हैं, वहीं पुरातत्वविद इसे प्राचीन सभ्यता का प्रमाण बताते हैं।
पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व
- धार्मिक महत्व – भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए यह स्थान मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।
- ऐतिहासिक शोध – समुद्री पुरातत्व के लिए यह जगह एक महत्वपूर्ण शोध स्थल है।
- आर्थिक योगदान – तीर्थयात्रा और पर्यटन से स्थानीय लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है।
निष्कर्ष – रहस्य अब भी जारी है
द्वारका(Dwarka) का इतिहास आस्था और विज्ञान के बीच एक सेतु की तरह है। पौराणिक कथाओं में वर्णित यह नगर वास्तव में अस्तित्व में था, इसके प्रमाण समुद्र के नीचे मौजूद हैं। फिर भी, इसके बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो अब तक अज्ञात है। चाहे इसे भगवान कृष्ण का नगर मानें या प्राचीन सभ्यता का अद्भुत नमूना, द्वारका आज भी भारत की सबसे रहस्यमयी जगहों में से एक है।
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