भारत रहस्यों और आस्था का देश है। यहाँ हर मंदिर, हर तीर्थस्थल के पीछे कोई न कोई चमत्कारी कथा या लोकमान्यता जुड़ी होती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहाँ फूल या नारियल नहीं, बल्कि खोपड़ी से पूजा की जाती है।
जी हाँ, आपने सही सुना – यहां देवी को मानव खोपड़ी चढ़ाई जाती है।
तो क्या ये काली शक्ति की साधना है? क्या यह तांत्रिकों का कोई रहस्यमयी केंद्र है?
चलिए जानते हैं इस रहस्यमयी मंदिर की पूरी कहानी।
खोपड़ी से होती है पूजा इस मंदिर में– कहां स्थित है यह रहस्यमयी मंदिर?
यह रहस्यमयी मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले में स्थित है, जिसे “तंत्र की राजधानी” भी कहा जाता है।
इस मंदिर का नाम है ‘भूत भावन मंदिर’ या ‘कपाली मंदिर’, जो काशी (वाराणसी) के कालीघाट क्षेत्र में स्थित है।
यह मंदिर माँ काली और भैरव साधना से जुड़ा हुआ है, और यहां के पुजारी मानव खोपड़ियों (कपाल) से पूजा करते हैं।
तंत्र साधना और कपाल पूजा का रहस्य
तंत्र परंपरा में “कपाल” (खोपड़ी) को मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।
यह कोई हिंसक या अमानवीय परंपरा नहीं, बल्कि एक गूढ़ और रहस्यमयी साधना है, जिसमें:
- आत्मा की क्षणिकता को समझा जाता है
- मृत्यु के भय पर विजय पाई जाती है
- शक्ति, सिद्धि और ज्ञान की प्राप्ति के लिए पूजा की जाती है
कहा जाता है कि तांत्रिक साधक कपाल पर जल, दूध या मदिरा चढ़ाकर देवी को प्रसन्न करते हैं। यह पूजा पूर्णिमा, अमावस्या और काली अष्टमी जैसे विशेष अवसरों पर होती है।
माँ काली और भैरव – इस परंपरा के केंद्र में
इस मंदिर में मुख्यतः माँ काली और भैरव बाबा की पूजा होती है।
माँ काली को तंत्र शास्त्र में प्रलय की देवी, विनाश और सृजन दोनों की जननी माना गया है।
भैरव, शिव का उग्र रूप हैं और तंत्र साधना के अधिष्ठाता माने जाते हैं।
खोपड़ी पूजा इस विचारधारा को दर्शाती है कि –
“मृत्यु ही जीवन का द्वार है। जब तक मृत्यु का भय नहीं मिटेगा, आत्मज्ञान संभव नहीं।”
क्या वास्तव में मानव खोपड़ी प्रयोग होती है?
यह प्रश्न स्वाभाविक है – क्या सच में पूजा में असली मानव खोपड़ी प्रयोग होती है?
उत्तर है – हाँ, लेकिन यह खोपड़ियाँ शवदाह गृहों या श्मशान घाटों से एकत्र की जाती हैं, और उनका उपयोग केवल तांत्रिक अनुष्ठानों या विशेष पूजा विधियों में होता है।
सामान्य श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में प्रवेश और पूजा की विधि सामान्य होती है, लेकिन गूढ़ साधकों के लिए यहां विशेष नियम हैं।
कुछ साधक इन कपालों को तावीज़ या रक्षा यंत्र के रूप में भी प्रयोग करते हैं।
ऐतिहासिक और पुराणिक संदर्भ
तंत्र ग्रंथों जैसे काली तंत्र, कुलार्णव तंत्र और रूद्रयामल में भी कपाल साधना का वर्णन मिलता है।
शिव स्वयं “कपालेश्वर” कहलाते हैं – यानी खोपड़ी धारण करने वाले।
शव साधना, कपाल साधना और श्मशान पूजा – ये सभी क्रियाएं आत्मज्ञान और भयमुक्ति की ओर ले जाती हैं।

साधक कौन होते हैं?
इस मंदिर में आने वाले साधक कोई आम लोग नहीं होते। ये होते हैं:
- तांत्रिक और सिद्ध योगी
- अघोरी साधक
- शक्ति उपासक
- वे लोग जो “माया” से ऊपर उठकर मुक्ति की चाह रखते हैं
ऐसे साधकों के लिए खोपड़ी पूजा कोई क्रूरता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन है।
अंधविश्वास या आस्था?
बाहर से देखने पर यह परंपरा डरावनी लग सकती है। लेकिन गहराई से समझें तो:
- यह कोई इंसानों की बलि देने या हिंसा से जुड़ी क्रिया नहीं है
- यह आत्मा, मृत्यु और चेतना के गूढ़ रहस्यों को समझने की साधना है
- इसे केवल अनुभव और मार्गदर्शन से ही किया जा सकता है
इसलिए इसे अंधविश्वास कह देना आध्यात्मिक परंपरा का अपमान है।
निष्कर्ष: क्या खोपड़ी से पूजा एक रहस्य है?
हाँ, यह परंपरा रहस्यमयी है, लेकिन इसका उद्देश्य अज्ञान और मृत्यु के डर को समाप्त करना है।
“खोपड़ी से पूजा होता है इस मंदिर में” – यह कथन केवल चौंकाने वाला नहीं, बल्कि भारत की गूढ़ आध्यात्मिक परंपराओं की झलक भी है।
आपकी राय?
क्या आपने कभी ऐसे किसी मंदिर के बारे में सुना था?
क्या आप खोपड़ी पूजा को आस्था मानते हैं या अंधविश्वास?
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