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अघोरी साधु क्यों खाते हैं इंसानी राख? – जानिए उनकी रहस्यमयी रीतियां और साधना का सच!

अघोरी साधु

Image credit by: Shutterstock

भारत में साधुओं और तपस्वियों की परंपरा प्राचीन काल से रही है, लेकिन इन सभी में सबसे रहस्यमयी और विचित्र माने जाते हैं – अघोरी साधु
अघोरी साधु सामान्य संन्यासी नहीं होते, बल्कि वे तंत्र, मृत्यु और आत्मा के गूढ़ रहस्यों को जानने वाले योगी होते हैं।
इन्हीं के बारे में एक प्रश्न सबसे ज़्यादा चौंकाता है:
“अघोरी साधु क्यों खाते हैं इंसानी राख?”

क्या ये कोई कुप्रथा है? अंधविश्वास है? या इसके पीछे कोई आध्यात्मिक उद्देश्य छुपा हुआ है?

चलिए जानते हैं इनके जीवन, रीतियों और रहस्यमयी साधना के बारे में विस्तार से।


कौन होते हैं अघोरी साधु?

“अघोरी” शब्द “अ-घोर” से निकला है, जिसका अर्थ है – जो डरावना न हो
अघोरी साधु वे होते हैं जो:

ये साधु श्मशान घाटों में रहते हैं, शव के पास ध्यान करते हैं, और उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करते हैं जो आम लोग अपवित्र मानते हैं।


इंसानी राख खाना – क्यों करते हैं ऐसा?

अब प्रश्न उठता है – अघोरी साधु क्यों खाते हैं इंसानी राख?

इसका उत्तर साधना और दर्शन में छुपा है।
इंसानी राख (श्मशान की भस्म) को खाना कोई मानसिक विकृति नहीं, बल्कि एक गहरी तांत्रिक साधना का हिस्सा है।

इसके पीछे 3 प्रमुख कारण हैं:


1. मृत्यु के भय को जीतना

2. अहंकार और शरीर के मोह का नाश

3. तांत्रिक शक्ति की प्राप्ति

अघोरी साधु
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अघोरी साधुओं की अन्य रीतियां

  1. श्मशान में साधना:
    वे शवों के पास ध्यान लगाते हैं, कभी-कभी शव पर बैठकर भी।
  2. खोपड़ी (कपाल) से भोजन और जल पीना:
    अघोरी भोजन के लिए मानव खोपड़ी का उपयोग करते हैं। इसे वे कपालपात्र कहते हैं।
  3. नग्नता:
    समाज के नियमों से मुक्त होने का प्रतीक – “जो कुछ नहीं ढँकता, वह कुछ नहीं छुपाता।”
  4. भस्म से शरीर को ढंकना:
    वे अपने शरीर पर भस्म मलते हैं, जो उन्हें मृत्यु का साक्षात अनुभव कराता है।
  5. मांस, शराब, और शव:
    तंत्र में “पंच मकार” का वर्णन है – मांस, मदिरा, मुद्रा, मैथुन और मत्स्य।
    अघोरी इन्हें आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में ग्रहण करते हैं, न कि भोगविलास के लिए।

क्या अघोरी खतरनाक होते हैं?

आम धारणाओं के विपरीत, अघोरी:

वे किसी धर्म या पंथ के विरोधी नहीं, बल्कि वे सभी भयों और द्वैतों से मुक्त साधक हैं।


क्या वे शिव के उपासक हैं?

हां!
अघोरी साधु स्वयं को “अघोreshwar शिव” के साधक मानते हैं –
एक ऐसा रूप जो मृत्यु, भूत, श्मशान और तांडव से जुड़ा है।

उनका मंत्र होता है –
“शिवोऽहम – मैं ही शिव हूँ”


निष्कर्ष: क्या अघोरी साधु इंसानी राख खाने के लिए पागल होते हैं?

नहीं!
अघोरी साधु क्यों खाते हैं इंसानी राख?” – इसका उत्तर मानसिक विकृति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता है।
उनका जीवन डर, माया, और मृत्यु से परे जाने की साधना है।

वे वो लोग हैं जो हर उस चीज़ को अपनाते हैं, जिसे समाज त्यागता है –
राख, शव, अकेलापन, श्मशान – ताकि वे आत्मा का सर्वोच्च ज्ञान पा सकें।


आपकी राय?

क्या आप मानते हैं कि अघोरीों का जीवन सिर्फ डरावना है या वो सच में एक अलग स्तर की चेतना में जीते हैं?
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